विरासत का जोश

 



राजनीति में कुर्सी मिलना जितना आसान है, उसे गरिमा के साथ निभाना उतना ही कठिन। खासकर तब, जब पद अनुभव से पहले और जोश समझदारी से पहले आ जाए। लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि का ओहदा केवल जीत का प्रमाण नहीं, बल्कि संयम का इम्तिहान भी होता है।

मेहनत से चढ़ी सीढ़ियाँ इंसान को झुकना सिखाती हैं, जबकि विरासत से मिली सीढ़ियाँ कई बार सिर घुमा देती हैं। शायद इसी लिए कहा गया है।

“तेरा लहजा बता रहा है कि तेरी दौलत नई-नई है।”

राजधानी के एक इलाके से पहली बार चुने गए, अपेक्षाकृत कम उम्र के जनप्रतिनिधि इन दिनों अपनी भाषा और तेवरों को लेकर चर्चा में हैं। सोशल मीडिया पर मौजूदगी बुरी बात नहीं, लेकिन सियासत में सड़कछाप संवाद और सदन की गरिमा का फर्क समझना ज़रूरी होता है।

हैरानी यह है कि ये तेवर उस वक्त नज़र आ रहे हैं, जब उनकी पार्टी सत्ता से दूर है। अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि अगर सत्ता साथ होती, तो संयम किस हाल में होता। राजनीति में याद रखना चाहिए कि आवाज़ ऊँची करने से कद बड़ा नहीं होता,कभी-कभी उल्टा असर भी पड़ता है।

राजनीतिक विरासत जागीर नहीं होती, और जनसमर्थन कोई स्थायी पट्टा नहीं। आज जो नाम, पहचान और तालियाँ हैं, वे कल सवालों में भी बदल सकती हैं।

लोकतंत्र में वही टिकता है जो रुतबे से ज़्यादा रवैये पर काम करता है। बाकी जोश अक्सर खबर बनता है,इतिहास नहीं।

                               (फिरदोस  अंसारी)

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