(शहर संवाददाता)
भोपाल। मध्य प्रदेश की राजधानी स्थित पंडित खुशीलाल शर्मा शासकीय आयुर्वेद महाविद्यालय एवं चिकित्सालय से एक गंभीर मामला सामने आया है। अस्पताल में पदस्थ एक चिकित्सक पर आरोप है कि उन्होंने सरकारी अस्पताल में इलाज कराने आई 8 वर्षीय बच्ची को निजी क्लीनिक बुलाकर दवाइयों के नाम पर ₹3500 वसूले। मामले ने तब और तूल पकड़ लिया जब शिकायतकर्ता परिवार से महिला थाना, रायसेन की टीआई ने मोबाइल नंबर पर संपर्क कर दबाव बनाने की कोशिश की।
8 वर्षीय बच्ची को अस्पताल से निजी क्लीनिक भेजने का आरोप
शिकायत के अनुसार, दिनांक 16 फरवरी 2026 को टॉन्सिल की समस्या से पीड़ित 8 वर्षीय बच्ची को खुशीलाल शर्मा आयुर्वेद अस्पताल में डॉक्टर प्रमेन्द्र अहिरवार को दिखाया गया था। आरोप है कि अस्पताल में परीक्षण के बाद डॉक्टर ने परिजनों से कहा कि अस्पताल की दवाएं बच्ची के लिए ठीक नहीं रहेंगी और बेहतर इलाज के लिए निजी क्लीनिक पर बुलाया।
परिवार का कहना है कि बच्ची की हालत को देखते हुए वे डॉक्टर के निजी क्लीनिक पहुंचे, जहां उनसे दवा की एक पुड़िया के लिए ₹2000 नगद और ₹1500 ऑनलाइन ट्रांसफर कराए गए। कुल ₹3500 लेने के बावजूद कोई पक्की रसीद या बिल नहीं दिया गया।
अस्पताल की दवाओं को बताया असरहीन
शिकायतकर्ता परिवार ने आरोप लगाया है कि डॉक्टर ने सरकारी अस्पताल में उपलब्ध दवाओं की गुणवत्ता पर सवाल उठाते हुए निजी क्लीनिक से दवा लेने का दबाव बनाया। इससे यह बड़ा सवाल खड़ा हो गया है कि क्या सरकारी अस्पताल के संसाधनों को कमजोर बताकर निजी कमाई का रास्ता बनाया जा रहा था।
शिकायत के बाद दबाव के आरोप
परिजनों ने इस पूरे मामले की शिकायत अस्पताल प्रशासन से की। शिकायत के बाद संबंधित डॉक्टर को नोटिस जारी किए जाने की जानकारी सामने आई, लेकिन इसके बाद घटनाक्रम ने नया मोड़ ले लिया। परिवार का आरोप है कि महिला थाना रायसेन की थाना प्रभारी ने सरकारी मोबाइल नंबर से फोन कर शिकायतकर्ता को रायसेन थाने बुलाया। बाद में भोपाल आकर मिलने की बात भी कही गई। शिकायतकर्ता का कहना है कि यह संपर्क डॉक्टर के खिलाफ की गई शिकायत के संबंध में था।
अब सवाल उठ रहे हैं कि एक महिला थाना अधिकारी ने अस्पताल विवाद में शिकायतकर्ता से संपर्क क्यों किया? शिकायतकर्ता का नंबर महिला थाना टीआई तक कैसे पहुंचा? क्या वर्दी और पद का उपयोग कर दबाव बनाने का प्रयास किया गया?
नोटिस में तारीखों का खेल?
मामले में अस्पताल प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठे हैं। आरोप है कि शिकायतकर्ता के बयान दर्ज कराने के लिए अप्रैल माह में नोटिस जारी किया गया, जबकि उसमें मार्च माह में उपस्थित होने का उल्लेख था। यानी नोटिस जारी होने से पहले की तारीख पर बयान के लिए बुलाया गया।
इससे प्रशासनिक रिकॉर्ड, दस्तावेजों की विश्वसनीयता और जांच प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
उठ रहे हैं बड़े सवाल
शिकायतकर्ता का नंबर महिला थाना रायसेन तक कैसे पहुंचा?
सरकारी मोबाइल नंबर से कॉल कर रायसेन बुलाने की जरूरत क्यों पड़ी?
क्या शिकायतकर्ता पर दबाव बनाने का प्रयास हुआ?
अप्रैल में जारी नोटिस में मार्च की तारीख कैसे दर्ज हुई?
क्या सरकारी अस्पताल से मरीजों को निजी क्लीनिक भेजने का संगठित खेल चल रहा है?
गरीब मरीज क्यों रहते हैं खामोश?
सरकारी अस्पतालों में आने वाले अधिकांश मरीज गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों से होते हैं। ऐसे परिवार अक्सर शिकायत करने से बचते हैं, क्योंकि उन्हें डर रहता है कि कार्रवाई के बजाय परेशान उन्हें ही किया जाएगा। यही वजह है कि इस तरह के कई मामले सामने नहीं आ पाते।
निष्पक्ष जांच की मांग
मामले ने तूल पकड़ लिया है। अब स्वास्थ्य विभाग, आयुष विभाग और जिला प्रशासन से निष्पक्ष जांच कर दोषियों पर सख्त कार्रवाई की मांग उठ रही है। यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह केवल एक डॉक्टर का मामला नहीं बल्कि सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था में भरोसे पर बड़ा सवाल माना जाएगा।


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