बरकतउल्लाह भोपाली: महान क्रांतिकारी जिन्होंने निर्वासित भारत सरकार का गठन किया

 


*पत्रकार शम्स उर रहमान अलावी द्वारा प्रकाशित लेख (NewsBits, 15 अगस्त 2016)।*


"मौत हमारी कीमत है, शहादत हमारा पुरस्कार और आज़ादी हमारी पेंशन" — यह नारा ग़दर पार्टी के क्रांतिकारियों ने भारत की स्वतंत्रता के लिए दिया था।

भोपाल में जन्मे मौलाना बरकतउल्लाह भोपाली उन महान क्रांतिकारियों में थे जिन्होंने अपना पूरा जीवन भारत की आज़ादी के लिए समर्पित कर दिया। वे ग़दर पार्टी के प्रमुख नेताओं में शामिल थे और शुरू से ही पूर्ण स्वतंत्रता के प्रबल समर्थक थे।

उस दौर में जब अधिकांश राजनीतिक नेता केवल सीमित अधिकारों या डोमिनियन स्टेटस की मांग कर रहे थे, तब बरकतउल्लाह और उनके साथी ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंककर भारत में स्वशासन स्थापित करने की योजना बना रहे थे।

प्रसिद्ध क्रांतिकारी लाला हरदयाल के सहयोगी बरकतउल्लाह का मानना था कि भारत को ब्रिटिश साम्राज्यवाद से मुक्त कराने के लिए अंतरराष्ट्रीय समर्थन आवश्यक है। उन्होंने अमेरिका, जापान, अफगानिस्तान सहित अनेक देशों में भारतीय क्रांतिकारियों को संगठित किया और रूसी क्रांति के नेताओं से भी संपर्क स्थापित किया।

बरकतउल्लाह ने दुनिया के कई देशों की यात्रा कर वहां रह रहे भारतीयों में स्वतंत्रता की भावना जगाई। लाल तुर्की टोपी पहनने वाली उनकी छवि आज भी देशभक्ति और संघर्ष का प्रतीक मानी जाती है।

जब क्रांतिकारियों ने अफगानिस्तान में निर्वासित भारत सरकार (Provisional Government of India) का गठन किया, तब राजा महेंद्र प्रताप सिंह को राष्ट्रपति और मौलाना बरकतउल्लाह भोपाली को प्रधानमंत्री बनाया गया। इस सरकार का उद्देश्य ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष को संगठित कर भारत को स्वतंत्र कराना था।

क्रांतिकारियों की गतिविधियों से ब्रिटिश सरकार चिंतित हो गई और उसने अपनी वैश्विक ताकत का उपयोग कर उनके प्रयासों को विफल करने की कोशिश की। प्रथम विश्व युद्ध के बाद बदले अंतरराष्ट्रीय हालातों ने भी उनकी योजनाओं को प्रभावित किया, लेकिन बरकतउल्लाह ने अपना संघर्ष जारी रखा।

अमेरिका, जापान, ब्रिटेन और जर्मनी सहित कई देशों की यात्राओं के दौरान उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के लिए समर्थन जुटाने का प्रयास किया। ब्रिटिश खुफिया एजेंसियां जीवनभर उनकी गतिविधियों पर नजर रखती रहीं।

ग़दर पार्टी और उसके नेताओं ने विदेशों में बसे भारतीयों के बीच स्वतंत्रता की जो चेतना जगाई, उसी का लाभ बाद में नेताजी सुभाष चंद्र बोस को भारतीय राष्ट्रीय सेना (INA) के गठन में मिला।

मौलाना बरकतउल्लाह का जन्म 7 जुलाई 1854 को भोपाल में हुआ था। वर्ष 1927 में अमेरिका यात्रा के दौरान भारतीय प्रवासियों को स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ने का आह्वान करते हुए भाषण देते समय उन्हें हृदयाघात हुआ और उनका निधन हो गया। उनका अंतिम संस्कार और दफन सैन फ्रांसिस्को में हुआ।

वे भारत की स्वतंत्रता देखने के लिए जीवित नहीं रहे, लेकिन उनके और उनके साथियों के प्रयासों ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को देश और विदेश दोनों स्तरों पर नई ऊर्जा प्रदान की।


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