सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: मध्य प्रदेश लोकायुक्त की SPE अब RTI के दायरे में, 2011 की अधिसूचना रद्द

 


(न्यूज़ डेस्क)


नई दिल्ली/भोपाल। पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश सरकार को बड़ा झटका देते हुए लोकायुक्त संगठन की स्पेशल पुलिस एस्टैब्लिशमेंट (SPE) को सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम से बाहर रखने वाली वर्ष 2011 की अधिसूचना को रद्द कर दिया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट कहा कि लोकायुक्त की SPE न तो कोई खुफिया एजेंसी है और न ही सुरक्षा संगठन, इसलिए उसे RTI कानून के दायरे से बाहर नहीं रखा जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि RTI अधिनियम की धारा 24 के तहत केवल उन्हीं संगठनों को छूट दी जा सकती है जो वास्तविक रूप से खुफिया जानकारी जुटाने या राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े कार्य करते हों। लोकायुक्त की SPE का मुख्य कार्य भ्रष्टाचार के मामलों की जांच करना, लोकसेवकों के खिलाफ शिकायतों की पड़ताल करना और भ्रष्टाचार निवारण कानून के तहत कार्रवाई करना है। ऐसे में उसे खुफिया या सुरक्षा एजेंसी मानना कानून की मंशा के विपरीत है।

क्या था मामला

यह विवाद उस समय शुरू हुआ जब एक पुलिस निरीक्षक ने अपने खिलाफ दर्ज भ्रष्टाचार प्रकरण से संबंधित कुछ दस्तावेज और जानकारी RTI के माध्यम से मांगी थी। लोकायुक्त SPE ने सूचना देने से इनकार करते हुए कहा कि मध्य प्रदेश सरकार द्वारा 25 अगस्त 2011 को जारी अधिसूचना के अनुसार SPE को RTI कानून से छूट प्राप्त है।
मामला पहले राज्य सूचना आयोग और फिर मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय तक पहुंचा। इसके बाद यह विवाद सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा, जहां अधिसूचना की वैधता को चुनौती दी गई थी।

सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी

शीर्ष अदालत ने कहा कि किसी एजेंसी को केवल जांच संबंधी कार्य करने के आधार पर RTI से बाहर नहीं किया जा सकता। अदालत ने माना कि RTI अधिनियम का उद्देश्य सरकारी संस्थाओं में पारदर्शिता बढ़ाना और जनता को जवाबदेही सुनिश्चित करना है।
न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि यदि किसी विशेष सूचना के खुलासे से जांच प्रभावित होती है, तो RTI अधिनियम में पहले से ही ऐसे प्रावधान मौजूद हैं जिनके तहत संबंधित सूचना रोकी जा सकती है। लेकिन पूरे संगठन को ही RTI से बाहर कर देना कानून सम्मत नहीं है।

2011 की अधिसूचना क्यों हुई निरस्त

मध्य प्रदेश सरकार ने वर्ष 2011 में एक अधिसूचना जारी कर लोकायुक्त की SPE और आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (EOW) को RTI अधिनियम की धारा 24 के तहत छूट प्रदान कर दी थी। सरकार का तर्क था कि इन एजेंसियों की जांच संबंधी गतिविधियों को गोपनीय रखने की आवश्यकता है।
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने माना कि धारा 24 का उद्देश्य केवल खुफिया और सुरक्षा संगठनों को संरक्षण देना है, न कि प्रत्येक जांच एजेंसी को। अदालत ने कहा कि राज्य सरकार ने अपने अधिकार क्षेत्र से आगे बढ़कर अधिसूचना जारी की थी, इसलिए उसे निरस्त किया जाता है।

फैसले के क्या होंगे प्रभाव

सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय के बाद लोकायुक्त की SPE पर RTI अधिनियम पूरी तरह लागू होगा। अब नागरिक, शिकायतकर्ता और आरोपी पक्ष कानून के तहत उपलब्ध सूचनाओं के लिए आवेदन कर सकेंगे। हालांकि ऐसी सूचनाएं, जिनका खुलासा चल रही जांच को प्रभावित कर सकता हो, RTI अधिनियम की अन्य धाराओं के तहत रोकी जा सकती हैं।

मध्य प्रदेश में क्यों है अहम फैसला

लोकायुक्त की SPE मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचार के मामलों की जांच करने वाली सबसे महत्वपूर्ण एजेंसियों में से एक है। रिश्वतखोरी, आय से अधिक संपत्ति और सरकारी भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों में यही एजेंसी कार्रवाई करती है। वर्षों से इसे RTI से बाहर रखने को लेकर सामाजिक कार्यकर्ताओं और सूचना अधिकार कार्यकर्ताओं द्वारा सवाल उठाए जाते रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले के बाद अब लोकायुक्त संगठन की कार्यप्रणाली पहले की तुलना में अधिक पारदर्शी और जवाबदेह मानी जा रही है।

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