नारियलखेड़ा में बुलडोजर की गूंज के बीच उजड़ गए आशियाने, जेसीबी के पंजों से टूटे मकान तो नम आंखों से समेटी गृहस्थी

 



(फिरदोस अंसारी)


भोपाल। नारियलखेड़ा इलाके का आज का माहौल आम दिनों से बिल्कुल अलग था। सुबह से ही नगर निगम की भारी गाड़ियों और जेसीबी मशीनों की आवाज से इलाका गूंज उठा। मशीनों के साथ भारी पुलिस बल और जिला प्रशासन के अधिकारी भी मौके पर मौजूद थे। कुछ ही देर में उन मकानों पर कार्रवाई शुरू हो गई, जहां कई परिवार वर्षों से रह रहे थे।

स्थानीय लोगों के अनुसार, बीती रात मकान खाली करने का ऐलान किया गया था। सुबह होते ही भारी पुलिस बल की मौजूदगी में मकान खाली कराने और इसके बाद उन्हें ढहाने की कार्रवाई शुरू कर दी गई। देखते ही देखते जिन घरों में वर्षों से परिवारों की जिंदगी बसी थी, वहां जेसीबी के लोहे के पंजे चलने लगे।


जेसीबी चली तो लोग हथौड़े लेकर घरों पर टूट पड़े

कार्रवाई शुरू होते ही मौके का दृश्य बेहद मार्मिक हो गया। जिन मकानों पर बुलडोजर चलने वाला था, वहां रहने वाले लोग जल्दबाजी में अपना सामान बाहर निकालते दिखाई दिए।

कोई हथौड़े से अपने घर की खिड़की निकाल रहा था तो कोई दरवाजा बचाने की कोशिश में उसे उखाड़ रहा था। किसी ने जरूरी सामान पोटली में बांधा तो कोई अपने घर की बची-खुची चीजें समेटकर बाहर निकल आया।

कुछ लोगों की आंखों में आंसू थे और सामने उनका वर्षों का आशियाना टूट रहा था।

एक तरफ जेसीबी के लोहे के पंजे मकानों को ढहा रहे थे, दूसरी तरफ परिवार अपनी वर्षों की गृहस्थी को समेटने में जुटे थे।


सबसे ज्यादा तकलीफ बच्चों की चीख-पुकार ने दी

कार्रवाई के दौरान मौके पर मौजूद लोगों के मुताबिक सबसे मार्मिक दृश्य बच्चों का था। जिन बच्चों ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि उनका घर एक दिन उनकी आंखों के सामने इस तरह टूट जाएगा, वे अपने परिवार के साथ सामान समेटते और रोते-बिलखते नजर आए।

मशीनों की तेज आवाज के बीच बच्चों की चीख-पुकार और परिजनों की बेबसी का दृश्य वहां मौजूद लोगों को भी विचलित कर रहा था।

इन बच्चों का इसमें कोई कसूर नहीं था। उन्होंने तो उसी घर में आंखें खोली थीं, जिसे आज अपनी आंखों के सामने टूटते हुए देखना पड़ा।


करीब पौन एकड़ जमीन पर कब्जे का दावा

फिजा कॉलोनी की कार्रवाई के पीछे जमीन के मालिकाना हक को लेकर चल रहे पुराने विवाद का भी उल्लेख सामने आता रहा है। उपलब्ध पुराने मीडिया रिकॉर्ड के अनुसार, उपासना जौहरी ने दावा किया था कि नारियलखेड़ा में उनकी लगभग पौन एकड़ जमीन है, जिस पर लोगों ने कब्जा कर मकान बना लिए हैं।

रिपोर्टों के मुताबिक जौहरी इस जमीन को लेकर लंबे समय से कानूनी लड़ाई लड़ रही थीं। उनका कहना था कि उनकी जमीन पर अतिक्रमण कर मकान बनाए गए हैं और अदालत से उनके पक्ष में राहत मिलने के बावजूद जमीन खाली नहीं कराई जा रही थी।

वर्षों पुराने इस विवाद में अलग-अलग समय पर अदालत और प्रशासन के स्तर पर कार्रवाई तथा रोक की स्थिति सामने आती रही है। यही वजह है कि वर्तमान कार्रवाई को भी उसी पुराने भूमि विवाद की अगली कड़ी के तौर पर देखा जा रहा है।

हालांकि, पौन एकड़ जमीन के दावे और वर्तमान में कार्रवाई की जद में आए प्रत्येक मकान के बीच वास्तविक कानूनी संबंध को राजस्व रिकॉर्ड, सीमांकन रिपोर्ट और न्यायालयीन आदेश के आधार पर ही अंतिम रूप से स्पष्ट किया जा सकता है।


एक पक्ष के लिए राहत, दूसरे के लिए उजड़ गया घर

अदालत में वर्षों तक चली लड़ाई के बाद जिसके पक्ष  फैसला आया , उसके लिए निश्चित रूप से यह राहत और संतोष का क्षण रहा होगा। लंबे समय तक अपने अधिकार के लिए कानूनी लड़ाई लड़ने के बाद जमीन पर अधिकार मिलने की उम्मीद पूरी होना किसी भी व्यक्ति के लिए बड़ी बात है।

लेकिन दूसरी तरफ उन परिवारों की स्थिति भी कई सवाल खड़े करती है, जिनके घर आज टूट गए।

कानून और अदालत के फैसले का सम्मान जरूरी है, लेकिन सवाल यह भी है कि वर्षों से किसी विवादित भूमि पर रह रहे परिवारों को हटाने का क्या कोई मानवीय और वैकल्पिक रास्ता संभव था?


क्या उन्हें पर्याप्त समय दिया जा सकता था

क्या उनके पुनर्वास या वैकल्पिक व्यवस्था पर विचार किया जा सकता था?

क्या हर मकान और हर परिवार के दस्तावेजों की अलग-अलग जांच और सीमांकन के बाद ही कार्रवाई होनी चाहिए थी?

ये ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब प्रशासन और संबंधित विभाग ही दे सकते हैं।


चार लोगों के स्टे लेने का स्थानीय लोगों का दावा

कार्रवाई के बीच स्थानीय रहवासियों ने यह भी बताया कि चार मकान मालिकों ने अदालत से स्टे लिया है। हालांकि, स्थानीय लोगों ने स्टे मिलने की कोई निश्चित तारीख नहीं बताई और न ही फिलहाल स्टे आदेश की प्रति सार्वजनिक रूप से सामने आई है।

कार्रवाई के बाद कई सवाल पीछे छोड़ गया बुलडोजर

नारियलखेड़ा में आज जेसीबी ने सिर्फ दीवारें नहीं गिराईं, बल्कि अपने पीछे कई सवाल भी छोड़ दिए हैं।

क्या विवादित भूमि पर वर्षों से रह रहे लोगों को हटाने से पहले पुनर्वास या वैकल्पिक व्यवस्था संभव थी?

क्या सभी मकानों का अलग-अलग सीमांकन किया गया था?

जिन लोगों के पास रजिस्ट्री या अन्य दस्तावेज होने का दावा है, उनके दस्तावेजों की स्थिति क्या है?

चार मकान मालिकों द्वारा लिए गए कथित स्टे का दायरा क्या है और क्या वह वर्तमान कार्रवाई से संबंधित है?


और सबसे बड़ा सवाल

अदालत के फैसले को लागू करने के लिए क्या मकानों को इसी तरह एक झटके में ढहाना ही एकमात्र रास्ता था, या कानून के दायरे में रहते हुए प्रभावित परिवारों को कुछ और समय, सुनवाई अथवा मानवीय राहत दी जा सकती थी?

नारियलखेड़ा की गलियों में आज जेसीबी की आवाज देर तक सुनाई देती रही। लेकिन मशीनों के रुक जाने के बाद भी उन परिवारों की आंखों में बसे सवाल शायद इतनी आसानी से शांत नहीं होंगे।

एक पक्ष ने वर्षों की कानूनी लड़ाई के बाद राहत की सांस ली होगी, लेकिन दूसरे पक्ष के लिए आज का दिन अपने घर, सामान और यादों के बिखर जाने का दिन बन गया।

कानून अपना रास्ता तय करता है, लेकिन किसी भी कार्रवाई की सफलता का असली पैमाना शायद यही होना चाहिए कि न्याय के साथ इंसानियत कितनी बची रही।

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ