(फिरदोस अंसारी)
भोपाल। राजधानी में सूचना का अधिकार (RTI) कानून की हालत क्या है, इसका ताजा उदाहरण सामने आया है। जहां एक साधारण सी जानकारी के लिए आवेदक को दर-दर भटकना पड़ा, और जिम्मेदार अधिकारी खुलेआम जवाबदेही से बचते नजर आए। मामला अब गंभीर सवाल खड़े कर रहा है कि आखिर प्रशासन क्या छुपाना चाहता है?
लाइब्रेरी निर्माण पर ‘रहस्यमयी चुप्पी’
पूरा मामला मौलाना आजाद सेंट्रल लाइब्रेरी परिसर में चल रहे निर्माण कार्य से जुड़ा है। सवाल बेहद सामान्य थे। टेंडर किसने जारी किया? निर्माण एजेंसी कौन है? किस आधार पर काम दिया गया?
लेकिन हैरानी की बात यह है कि इन बुनियादी सवालों पर ही प्रशासन ने चुप्पी साध ली। RTI आवेदन शहर वृत पहुंचा, मगर लोक सूचना अधिकारी ने न तो समय पर जवाब दिया और न ही कोई ठोस जानकारी दी।
कलेक्टर के आदेश भी ‘कागजों तक सीमित’
जब मामला प्रथम अपील में गया, तो कलेक्टर भोपाल ने स्पष्ट आदेश (प्रकरण क्रमांक-233/अपील/सू. अ /2025) दिए कि जानकारी उपलब्ध कराई जाए। लेकिन नतीजा “सूचना उपलब्ध नहीं है” कहकर फाइल बंद!
यह भी सामने आया कि अपील से पहले आवेदक से कोई संवाद तक नहीं किया गया। यानी नियमों को दरकिनार कर सीधे जवाब से बचने की रणनीति अपनाई गई।
एक सवाल, तीन दफ्तर—तीन ‘सच’!
RTI के तहत बैरागढ़, गोविंदपुरा और शहर वृत की BPL शाखाओं से एक ही जानकारी मांगी गई, लेकिन तीनों ने अलग-अलग कहानी गढ़ दी—
1- शहर वृत: ने पत्र क्रमांक 01/सू.अ. /रीडर/2026 जारी कर जानकारी दी कि 1, 2 और 4 नंबर बिंदु की जानकारी “उपलब्ध नहीं” बता दी गई।
2- गोविंदपुरा वृत: ने पत्र क्रमांक 6/री अ वि अ गो/ 2026 जारी कर जानकारी दी कि बिंदु 1 कार्यालय से “संबंधित नहीं”, । बिंदु क्रमांक 3 में स्थल सहायक - एस. पी जायसवाल , एम.एम. शर्मा और स्थाई कर्मी अतुल सिंह सेंगर और अनिल श्रीवास के नाम की जानकारी दी गई। बाकी को “व्यक्तिगत” और “प्रश्नात्मक” बताकर टाल दिया।
3-बैरागढ़ वृत: यहां तो जवाब देने की जहमत तक नहीं उठाई गई,पूरी तरह चुप्पी साध ली गई।
यह विरोधाभास साफ संकेत देता है कि या तो रिकॉर्ड ही व्यवस्थित नहीं है, या फिर जानबूझकर जानकारी छिपाई जा रही है।
सूत्रों के अनुसार, कई मामलों में जानबूझकर जानकारी रोकी जाती है ताकि आवेदक अपीलों में उलझकर थक जाए। क्योंकि अगर मामला राज्य सूचना आयोग पहुंचता है, तो सुनवाई में सालों लग जाते हैं।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, 2025 के आसपास राज्य सूचना आयोग में द्वितीय अपील के लगभग 18,000 से ज्यादा मामले लंबित थे। यानी न्याय मिलने में 4-5 साल तक का इंतजार!
भोपाल में सामने आए इन मामलों ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं—
क्या जानकारी छिपाने के लिए जानबूझकर अलग-अलग जवाब दिए जा रहे हैं?
कलेक्टर के आदेशों की भी अनदेखी क्यों?
और सबसे अहम—
क्या RTI कानून को कमजोर करने की कोशिश हो रही है?
यदि समय रहते इस पर सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो पारदर्शिता का यह कानून सिर्फ कागजों में ही सिमटकर रह जाएगा।

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