स्मार्ट मीटर पर सरकार का नया फैसला: अब अनिवार्य नहीं, उपभोक्ता की मर्जी जरूरी

 



(विशेष संवाददाता)

नई दिल्ली। स्मार्ट बिजली मीटर को लेकर देशभर में चल रहे विरोध और भ्रम के बीच सरकार ने बड़ा फैसला लिया है। संसद में साफ किया गया है कि स्मार्ट या प्रीपेड मीटर आम उपभोक्ताओं के लिए अनिवार्य नहीं हैं, बल्कि यह पूरी तरह वैकल्पिक व्यवस्था है। यानी अब कोई भी उपभोक्ता अपनी इच्छा के अनुसार ही स्मार्ट मीटर लगवाएगा। हालांकि, बिजली बिल नहीं भरने वाले उपभोक्ताओं पर प्रीपेड मीटर लागू किया जा सकता है।

स्मार्ट मीटर को लेकर सबसे बड़ा डर बिजली बिल बढ़ने का है, लेकिन सच्चाई यह है कि मीटर खुद बिल नहीं बढ़ाता। यह केवल सटीक रीडिंग देता है, जिससे पहले की तुलना में वास्तविक खपत सामने आती है। कई मामलों में पुराने बकाया जुड़ने या पहले कम रीडिंग होने के कारण बिल ज्यादा महसूस होता है, जिससे लोगों में गलतफहमी पैदा होती है।

दरअसल, स्मार्ट मीटर एक डिजिटल तकनीक है जो बिजली की खपत को रियल टाइम में रिकॉर्ड कर सीधे बिजली कंपनी तक पहुंचाती है। इससे बिलिंग में पारदर्शिता आती है और बिजली चोरी पर रोक लगती है। हालांकि, प्रीपेड सिस्टम में समय पर रिचार्ज करना जरूरी होता है, नहीं तो बिजली सप्लाई बंद हो सकती है। ऐसे में उपभोक्ताओं को जागरूक रहकर ही इस सुविधा का चयन करना चाहिए।


केंद्रीय ऊर्जा मंत्री मनोहर लाल ने गुरुवार को लोकसभा में एक पूरक प्रश्न के जवाब में स्पष्ट किया कि बिजली के प्रीपेड स्मार्ट मीटर लगवाना अनिवार्य नहीं है, बल्कि यह एक वैकल्पिक व्यवस्था है। उन्होंने यह भी कहा कि जिन उपभोक्ताओं के स्मार्ट मीटर लगे हैं, वे इसे हटा नहीं सकते, लेकिन आम उपभोक्ताओं पर इसे थोपा नहीं जा सकता। 

वैकल्पिक सुविधा: मनोहर लाल ने कहा कि स्मार्ट प्रीपेड मीटर सुविधा उन लोगों के लिए है जो इसे चाहते हैं।


दबाव का खंडन: उन्होंने इस दावे को नकारा कि सरकार निजी कंपनियों के फायदे के लिए जबरन मीटर लगवा रही है।


सुधार के लिए: उन्होंने स्पष्ट किया कि बार-बार बिजली बिल न भरने वालों पर मीटर बदलने के लिए दबाव डाला जा सकता है, लेकिन यह अनिवार्य नहीं है।


छोटे रिचार्ज की सुविधा: गरीब उपभोक्ताओं के लिए छोटे रिचार्ज के विकल्प भी उपलब्ध हैं।


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