“RTI पर अफसरशाही का ताला”: धाराओं की अनदेखी कर अपीलें खारिज, आयोग पहुंचते ही आदेशों की खुलती पोल

 


 कानून कुछ कहता है, अधिकारी कुछ और कर रहे; बिना जानकारी दिए फाइलें बंद



कानून साफ, फिर भी सूचना रोकी जा रही; अपील अधिकारियों के आदेशों में न धारा, न तर्क

(फिरदोस अंसारी)

भोपाल। सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 आम नागरिक को सरकारी कामकाज में पारदर्शिता सुनिश्चित करने का मजबूत हथियार देता है, लेकिन हालिया मामलों ने यह उजागर कर दिया है कि जिम्मेदार अधिकारी ही इस कानून की धाराओं की खुलेआम अनदेखी कर रहे हैं।

लोक सूचना अधिकारी के अपने ही नियम

05 अप्रैल 2026 को गोविंदपुरा वृत, शहर वृत और बैरागढ़ वृत से चार बिंदुओं पर जानकारी मांगी गई थी। लेकिन तीनों कार्यालयों ने RTI कानून की मूल भावना के विपरीत काम किया। शहर वृत ने एक बिंदु पर  अप्रमाणित और अधूरी जानकारी दी, गोविंदपुरा वृत ने केवल एक बिंदु पर अधूरी जानकारी देकर बाकी देने से मना कर दिया, जबकि बैरागढ़ वृत ने पूरी तरह चुप्पी साध ली।

RTI अधिनियम की धारा 7(1) स्पष्ट रूप से कहती है कि लोक सूचना अधिकारी को 30 दिनों के भीतर पूरी और सही जानकारी उपलब्ध कराना अनिवार्य है। यहां न तो समयसीमा का पालन हुआ और न ही “पूर्ण जानकारी” दी गई।

यदि मांगी गई जानकारी किसी अन्य विभाग से संबंधित हो, तो धारा 6(3) के तहत आवेदन को 5 दिनों के भीतर संबंधित अधिकारी को स्थानांतरित करना होता है। लेकिन यह जिम्मेदारी खत्म नहीं करता। आवेदक को जानकारी मिलना सुनिश्चित करना भी आवश्यक है।

सबसे महत्वपूर्ण, धारा 7(9) का अक्सर गलत उपयोग किया जाता है। यह धारा केवल यह कहती है कि जानकारी उसी रूप में दी जाए जिसमें मांगी गई है, जब तक कि इससे संसाधनों पर अत्यधिक दबाव न पड़े। लेकिन “वृहद जानकारी” बताकर सूचना देने से इंकार करना इस धारा का दुरुपयोग है, न कि उसका सही अनुप्रयोग।

प्रथम अपील: अधिकार या औपचारिकता?

जब इन मामलों में प्रथम अपील दायर की गई, तो अपीलिय अधिकारी (कलेक्टर) भोपाल ने तीनों मामलों में एक जैसे आदेश पारित कर अपीलों को खारिज कर दिया। आदेश में कहा गया कि “विशिष्ट जानकारी नहीं मांगी गई” और “जानकारी वृहद है”।



जबकि धारा 19(1) नागरिक को प्रथम अपील का अधिकार देती है और धारा 19(6) के अनुसार अपील का निपटारा 30 से 45 दिनों के भीतर “युक्तिसंगत और कारणयुक्त आदेश” (Speaking Order) के साथ किया जाना चाहिए।



यहां आदेशों में न तो तथ्यों का विश्लेषण था, न ही किसी धारा का हवाला। यानी यह स्पष्ट रूप से अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन है।

(बिना जानकारी दिए ‘प्रकरण समाप्त’ कानून के खिलाफ है)

आयोग में धड़ाम हो जाते है प्रथम अपील आदेश

जून 2024 के एक अन्य मामले में कलेक्टर कार्यालय भोपाल की खाद्य शाखा के लोक सूचना अधिकारी ने आवेदन को दूसरे जिले में भेजकर जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया। प्रथम अपील में भी यही तर्क दोहराते हुए मामला समाप्त कर दिया गया।

जबकि कानून के अनुसार, सूचना उपलब्ध कराए बिना किसी भी प्रकरण को समाप्त करना पूरी तरह अवैध है। धारा 19(8) सूचना आयोग को यह अधिकार देती है कि वह संबंधित अधिकारी को जानकारी देने के निर्देश दे और आवश्यकता पड़ने पर कार्रवाई भी करे।

आयोग में खुलती है सच्चाई

जब यही मामला राज्य सूचना आयोग पहुंचा, तो अक्टूबर 2024 में आयोग ने प्रथम अपील अधिकारी के आदेश को निरस्त करते हुए अपीलार्थी के पक्ष में फैसला सुनाया और 15 दिनों के भीतर जानकारी देने के आदेश (आदेश क्रमांक 5320/2024) जारी किए।

यह दर्शाता है कि निचले स्तर पर RTI कानून की अनदेखी हो रही है और अपील अधिकारियों की भूमिका निष्पक्ष न होकर औपचारिक बनती जा रही है।


RTI अधिनियम की धारा 20 में स्पष्ट प्रावधान है कि यदि लोक सूचना अधिकारी बिना उचित कारण जानकारी देने में विफल रहता है या गलत/भ्रामक जानकारी देता है, तो उस पर प्रतिदिन के हिसाब से जुर्माना लगाया जा सकता है।

इसके बावजूद, जमीनी स्तर पर ऐसे मामलों में न तो कार्रवाई होती है और न ही अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाती है।

यह पूरा प्रकरण यह साबित करता है कि सूचना का अधिकार कानून केवल कागजों तक सीमित होता जा रहा है। जब प्रथम अपील अधिकारी ही कानून की धाराओं को नजरअंदाज कर “रूटीन आदेश” पारित करेंगे, तो आम नागरिक को न्याय कहां से मिलेगा?

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